Saturday, January 3, 2009

अब स्वयं के लिए लड़ने वाले स्वतन्त्रता सेनानी की व्यथा .

पहले देश के लिए लड़े... अब स्वयं के लिए लड़ने वाले स्वतन्त्रता सेनानी की व्यथा .
देश की आजादी के लिए लड़ने वाले स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी बाबूलाल सोनी को अब अपनी जमीन वापसी की लडाई लड़ना पड़ रही है .अपने परिवार के पैतीस सदस्यों के लिए अठारह साल पहले खरीदी जमीन को पाँच साल पहले मध्य प्रदेश ग्रह निर्माण मंडल ने नई कालोनी बनाने के लिए अधिग्रहित करने का नोटिस बाबूलाल सोनी को सन २००२ में प्राप्त हुआ . श्री सोनी ने अपनी जमींन देने से साफ़ इनकार कर दिया .इसके बावजूद सरकारी कार्यवाही जारी रही . वे अपनी जमीन को अधिग्रहण से मुक्त करवाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर , प्रदेश के राज्यपाल बलराम जाखड व् कांग्रेश की राष्ट्रीय अध्यछ सोनिया गाँधी से मिल चुके है . जिसके आधार पर हुई लिखा - पडी के कागजात भी बाबूलाल सोनी के पास है . इसी तरह छह वर्ष बीत गये पर उनकी जमीन मुक्त नही हुई . अब वे राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल से मिलना चाहते है . वे कहते है की न्याय तो मै लेकर ही रहूंगा . पहले अंग्रेजो से देश के लिए लड़े थे अब अपने ही देश में अपने लिए लड़ रहा हूँ . खंडवा शहर के हरिगंज में रहने वाले बाबूलाल सोनी ने सन १९३० में छात्र जीवन में अंग्रेजो के ख़िलाफ़ लम्बी लडाई लडी . फर्जी नाम से सेना में भरती हुए और कोर्ट मार्शल भी झेला . लाहोर जेल में एक वर्ष रहे . सरकारी तौर पर मान्यता प्राप्त इस स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी का सम्मान प्रत्येक वर्ष १५ अगस्त और २६ जनवरी को करने वाली सरकार और उसके नुमाइंदो ने ही उनकी जमीन पर कब्जा कर लिया . हाल ही में राज भवन भोपाल राज्यपाल के विशेष सहायक मोनिका जोशी द्वरा बाबूलाल सोनी को भेजे पत्र की पर्ति ६/५/२००८ में प्रमुख सचिव म.प्र. शासन , राजस्व विभाग , मंत्रालय को आवश्यक कार्यवाही हेतु पत्र प्रेषित किया . लेकिन कोई कार्यवाही नही हुई . ..... उन्होंने अपनी लडाई २० सितम्बर सन २००२ में कलेक्टर को पत्र लिखकर आरम्भ की ,उसने बाद भूअर्जन अधिकारी के समछ आपत्ति लगाई . १९ जनवरी सन २००३ में तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को पत्र लिखा जिसके जवाब में म.प्र. हाऊसिंग बोर्ड भोपाल से पत्र आया की शहर में आवास समस्या को कम करने तथा हितग्रहियों को उचित कीमत पर भाडा क्रय योजना के अंतर्गत आवास उपलब्ध करवाने हेतु आपकी भूमि का चयन किया जिसके प्रस्ताव को कार्यपालन यंत्री संभाग खंडवा के माध्यम से कलेक्टर को प्रस्तुत किया . और कलेक्टर कार्यालय में भू अर्जन की धारा ke तहत आपत्ति प्रस्तुत करने हेतु अवसर प्रदान किया . अब इस भूमि को अधिग्रहण से मुक्त करना मंडल स्तर पर संभव नही होता ... अब तक की लडाई लड़ चुके इस स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी को सिर्फ़ राष्ट्रपति से ही उमीद है की वे उन्हें उनकी जमीन प्रदेश सरकार से वापस दिलाएंगी . ANANT MAHESHWARI KHANDWA M.P.

Tuesday, December 30, 2008

सेनानी की लडाई .. पुत्र के हवाले

पिछले सताईस वर्षों से अपने दिवंगत पिता को स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी का दर्जा दिलाने की जद्दोजहद में जुटे है गोपाल भुजबल ....
कभी स्वतन्त्रता संग्राम की लडाई लड़ने वाले रघुनाथ भुजबल ने कभी यह नही सोचा होगा की उसे स्वतन्त्रता सेनानी का दर्जा पाने की लडाई भी लड़नी पडेगी . इस लडाई को लड़ते-लड़ते तीस अगस्त सन दो हजार दो में उनकी मौत हो गई . पिता की मौत के बाद उन्हें सम्मान दिलाने की लडाई उनके पुत्र गोपाल भुजबल लड़ रहे है.
इसके लिए उन्होंने प्रदेश सरकार से लेकर जिला स्तर तक लिखा पड़ी की पर कुछ हासिल नही हुआ . . आज भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर इस उम्मीद में काट रहे है की उनके पिता को वह सम्मान दिला सके जिसके वो हकदार थे .
आठ जनवरी उननीस सौ अठारह को बुरहानपुर में जन्मे रघुनाथ भुजबल {सोनी} दस साल की उम्र में ही खंडवा आकर अपनी बहन रमा बाई पासे के घर आकर रहने लगे . यहा रहते हुए उन्होंने पदाई पुरी की और ब्रिटिश सरकार की सी.आई.डी में हवलदार पद पर नौकरी की . नौकरी में रहते हुए वे गुप्त रूप से स्वतन्त्रता सेनानियों की मदद किया करते रहे . सन १९३२ में महात्मा गांधी के आन्दोलन को समर्थन देने के आरोप में रघुनाथ सोनी गिरफ्तार किए जहाँ से वे फरार हो गये . जिसका जिक्र "पूर्व निमाड़ जिले के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी" नामक पुस्तक में है जिसे जिले के प्रख्यात स्वतन्त्रता सेनानी डा. सिद्धनाथ आगरकर ने लिखा है . ब्रिटिश काल में जिस अफसर के माह्तत रहे उन्होंने भी अपने पत्र में लिखा की इन्होने पुलिस प्रशासन से त्यागपत्र देकर भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया . इसे ढेरो पत्र गोपाल भुजबल के पास है जिन्हें मान्य स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों ने लिखा . मद्य प्रदेश के पूर्व मुख्मंत्री भगवंतराव मंडलोई जो की ख़ुद स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे ने भी अपने पत्र में लिखा की रघुनाथ भुजबल ने पुलिस प्रशासन से त्यागपत्र देकर आन्दोलन में हिस्सा लिया .
सन १९६५ को इलाहबाद में हुए स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी महासम्मेलन में इंदिरा गांधी ने मैडल देकर रघुनाथ सोनी को सम्मानित किया .
फ़िर भी उन्हें स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी का दर्जा इसलिए नही मिल सका क्योकि उनका जेल रिकार्ड नही था . होता भी कैसे वे पकडे जाने के बाद फरार हो गये थे . उस वक्त मध्य परदेश की राजधानी विदर्भ नागपुर हुआ करती थी . इसलिए पुलिस की नौकरी का रिकार्ड भी नही मिला सका . रही बात स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों के पत्रों की .जो रघुनाथ भुजबल को स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी होना प्रमाणित करते है .. सरकार उसे प्रमाणिक तथ्य नही मानती .. इन सभी दस्तावेजों के आधार पर गोपाल भुजबल ने प्रदेश सरकार से लेकर जिले के आला अधिकारियों ,नेताओं से मुलाक़ात की सभी ने सिर्फ़ आश्वासन दिया . पर वह सम्मान नही दिया जिसकी लडाई पिछले सताईस सालों से गोपाल लड़ रहे है . वे आज भी अपनी लडाई जारी रखे हुए है की कभी तो उनके दिवंगत पिता को वह सम्मान मिलेगा जिसे पाने के वे हकदार थे ......

Sunday, December 28, 2008

अपनी बात


aatnkvaadiyon ko paalne posne vaale paakistaan ko nestaanaabud kar denaa hi aatnk ka khanmaa hogaa.